anapansati buddha

4. आनापानसति ध्यान विधि

आनापानसति ध्यान साधना (श्‍वास द्वारा ध्‍यान का अभ्‍यास)

हमारे मन का ये स्‍वभाव है कि उसको हर समय विचार करने के लिये कुछ ना कुछ चाहिये। वो व्‍यर्थ ही दिन भर हजारों प्रकार के विचार करता रहता है। वो उन्‍ही चीजों पर सोचता है जिनको हम देखते सुनते है। इसके अलावा उन सब देखी सुनी बातों के आधार पर वो सैंकडो काल्‍पनिक विचार भी बना लेता है लेकिन यदि हम उसको इन सब विषयों से हटा कर किसी कार्य में लगा दे तो वो बहुत जल्‍दी शान्‍त भी हो जाता है क्‍योंकि उसको एक खिलौना मिल गया। ध्‍यान की ये विधि मन को शान्‍त करने का सबसे सरल माध्‍यम है। आगे विस्‍तार से इसकी विधि समझाई गयी है।
इस ध्यान का अभ्यास करना बहुत सरल है, तनिक भी कठिनाई इसमें नहीं है। यह बहुत ही आसान है। कोई भी सीधे ही आनापानसति ध्यान का अभ्यास आरम्भ कर सकता है, इसमे केवल उसे अपने सामान्य श्वास – प्रश्वास के प्रति सजग रहना है। ये ध्‍यान रखें कि ध्‍यान की किसी भी क्रिया में मन का पूर्ण सहयोग न होने पर सफलता मिलना असम्‍भव है। शुरू में ध्‍यान की किसी भी क्रिया को करते समय हमारा मन बार बार भटकता है मगर उससे उत्‍तेजित न हो और अपने मन को पुन: वही पर ले आयें ऐसा बार बार होगा मगर परेशान होने की जरूरत नही है यही मनुष्‍य का स्‍वभाव है धीरे धीरे ही मन नियंत्रण में आता है। मात्र एक महीने के अन्‍दर ही आप अपने में बदलाव महसूस करेंगे। इससे आपके शरीर में व्‍याप्‍त विभिन्‍न प्रकार के असाध्‍य रोग भी ठीक हो जाते है और ध्‍यान की अन्‍य विधियों की अपेक्षा इससे प्राण शक्ति सबसे शीघ्रता से बढती है।
पाली भाषा में,
‘आन’ का अर्थ है श्वास लेना
‘अपान’ का अर्थ है श्वास छोड़ना
‘सति’ का अर्थ है ‘के साथ मिल कर रहना’
गौतम बुध्द ने हज़ारों वर्ष पूर्व ध्यान की यह विधि सिखाई थी। साँस तो हम सभी लेते हैं परन्तु हम इस क्रिया के प्रति जागरूक नहीं होते। ‘आनापानसति’ में व्यक्ति को अपना पूरा ध्यान और जागरूकता अपनी सामान्य श्वसन – प्रक्रिया पर रखने की आवश्यकता होती है। यह आवश्यक है कि हम साँस पर सजगतापूर्वक अपनी निगाह टिकाकर रखें, साँस की क्रिया तो स्वाभाविक रूप से चलती रहनी चाहिए। साँस को किसी भी रूप में रोकना नहीं है हमें अपनी ओर से इसकी गति में किसी भी प्रकार का परिवर्तन लाने का प्रयास नहीं करना है। जब मन इधर उधर भागने लगे तो तुरन्त विचारों पर रोक लगा कर पुनः अपने ध्यान को श्वास की सामान्य लय पर ले आना चाहिए। स्वयं को शिथिल छोड़ कर मात्र प्रेक्षक बन जाना चाहिए। इससे हमारी चेतना का विस्‍तार होता है तथा हमारी जागरूकता बढ जाती है।।
साँस के प्रति जागरूक रहने का अर्थ है विचारों को मन पर नियन्त्रण न करने देना। ये विचार ही हमारी ऊर्जा को खींचकर बिखरा देते हैं। इसीलिए विचारों के चक्र को विचार के जन्म के साथ ही रोक देना चाहिए। साँस के प्रेक्षण का अर्थ है कि हम किसी भी रूप में अपनी भौतिक इन्द्रियों अथवा विचारों द्वारा अपने साँस की लय को प्रभावित न करें, केवल उस पर निगाह ही रखें।
जब आत्मा की ऊर्जा हमारे विक्षुब्ध व अनन्त विचारों द्वारा व्यय कर दी जाती है तो हमारा भौतिक शरीर निर्बल हो जाता है। ऐसी स्थिति में उस पर विविध प्रकार के बाहरी आक्रमण होने लगते हैं। इसके प्रभावस्वरूप व्यक्ति को कई प्रकार के रोग लग जाते हैं, बुढ़ापा आने लगता है और शीघ्र ही वह मृत्यु का ग्रास बन जाता है। जो लोग अपने मन का परिष्कार नहीं करते, उनका मन इसी प्रकार अशांत रहा करता है। जिस प्रकार एक खेत, जिसे कृषि हेतु तैयार न किया हो, खर – पतवार से भर जाता है, उसी प्रकार एक निरंकुश मन भी अनचाहे विचारों से भर जाता है। अतः आरम्भ में तो ध्यान का अर्थ है मन को शांत व उद्वेलनरहित बनाना। शीघ्र ही एक गहन विश्रामयुक्त अवस्था प्राप्त कर ली जाती है। जब मन विचारों से रिक्त हो जाता है तब अतिशय मात्रा में वैश्विक ऊर्जा यानि कि आत्‍मशक्ति या प्राण शक्ति हमारे शरीर में भरने लगती है। जैसे – जैसे हम ध्यान करते चले जाते हैं, नए गहन अनुभव, नए दृश्य हमें दिखाई देने लगते है और हम विश्व – चेतना के साथ फिर से जुड़ने लगते हैं। हम एक आश्चर्यों से भरे जगत में पहुँच जाते हैं जो हमारी प्रतीक्षा कर रहा हैं। आप जितना अधिक प्रयास करते हैं जागरूकता को पाना उतना ही अधिक आसान होता जाता है।
आनापानसति ध्यानी होने के लिए व्यक्ति को किसी आश्रम में जाने की आवश्यकता नहीं होती। न तो ये ध्‍यान करने के लिये किसी निश्चित स्थान पर जाना होता है और न ही अपने उत्तरदायित्वों का त्याग करना होता है। इस ध्‍यान साधना का अभ्‍यास करते हुये हम अपना सामान्य जीवन जी सकते हैं और यह देख सकते हैं कि किस प्रकार ध्यान की शक्ति हमें बदल कर हर क्षेत्र में बेहतर बना देती है। हम कभी भी, कहीं भी, अपनी इच्छा से इसका अभ्यास कर सकते हैं। यदि बैठ कर करते है तो सबसे अच्‍छा है लेकिन यदि बैठने का मौका ना हो आप किन्‍ही आवश्‍यक कार्यो में व्‍यस्‍त हो तो इसको अपने कार्य करते व चलते फिरते भी कर सकते है लेकिन किसी भी प्रकार के ध्‍यान का अभ्‍यास कोई भी वाहन चलाते समय या किसी मशीन पर काम करते हुये न करे जिससे कि दुर्घटना की सम्‍भावना हो। ये ध्‍यान का सबसे सरल तरीका है। इसको चाहे हम कितनी भी देर करे इसके कोई अप्रिय दुष्प्रभाव भी नहीं होते। सीनियर ध्यानियों के साथ अपने अनुभवों बाँट कर हम अपनी प्रगति का मूल्यांकन भी स्वयं कर सकते हैं। यह ध्‍यान का सबसे सरल उपाय है और इससे भी वह सभी लाभ और शक्तियां व सिद्धियां मिलती है जो ध्‍यान साधना के दूसरे उपायों से मिलती है। यह ध्यान एक महानतम उपहार है जो हम बहुत थोडे प्रयास से अपने जीवन को दे सकते हैं। ‘आध्यात्मिक स्वास्थ्य’ हमारे सम्पूर्ण स्वास्थ्य का बहुत महत्वपूर्ण व अभिन्न भाग है जिसकी हर व्यक्ति को आवश्यकता है। आनापानसति ध्यान इस आवश्यकता की पूर्ति करता है। इस प्रकार यदि ‘आध्यात्मिक स्वास्थ्य’ जड़ है तो ‘भौतिक स्वास्थ्य’ उसका फल है। ध्यान द्वारा अपनी शारीरिक व्याधियों के पीछे छिपे सही कारण को तो समझने के साथ साथ उन बीमारियों का स्‍वत: ही समाधान हो जाता है। यदि हम साँस के साथ सजग होकर रहें तो हमारे भीतर ही जागरूकता का केन्द्र बन जाएगा… तब हमारा शरीर ही ब्रह्माण्ड बन जाएगा।
किसी भी प्रकार की ध्‍यान साधना करने के लिये ये आवश्‍यक है कि हम साफ सफाई से रहे। सादा भोजन करे। हर प्रकार के नशे वैर भाव व फालतू के वाद विवाद से दूर रहे तो सफलता सुनिश्चित है।

-नीरज मित्तल 


 

आलती पालती बना के बैठे या सुखासन मे बैठे अब दोनो हाथो की अँगुलियो को आपस मे फँसा लिजिये आराम से अब आँखे बँद किजिये और शाँत बैठ जाये एकदम शाँत बैठे रहे शाँत शाँत शाँत आप को साँस लेने का भी प्रयास नही करना है अब आप पायेँगे की साँस खुद चलेगी वो अँदर आयेगी बाहर जायेँगी आप को बस देखना है दृष्टा बन जाना है आप को जानबूझकर साँस न लेना न छोडना है क्योकि ऐसा करेँगे तो विचार थोडी देर को पीछा छोड देँगे पर आप स्थायी शाँति की दशा को प्राप्त न कर पायेँगे क्योकि जब भी  विचार भाव बनते है तो हमारी प्राकृतिक साँस बदल जाता है प्राकृतिक साँस मे ही शक्ति है और वो हल्की कोमल और लय युक्त होती है शाँत बैठो बस कोई प्रयास नही खुद चलेगी उसे देखो बस धीरे धीरे छोटी होकर माथे पर अनुभव होगी अब नाक से आने जाने का पता करना कठिन है अब मन विचार शून्य होगा तब काम शुरू होगा ब्रह्मरँध्र का अब कास्मिक ऊर्जा आयेगी जो सिर से शरीर मे उतरेगी और नाडी मँडल शुद्ध करेगी जितना ध्यान उतना ऊर्जा आप प्राप्त करेँगे गर आप ठीक तरह प्रयास करेँगे तो एक महीने काफी है की आप को गहरी शाँति अनुभव होगी

मै ये निश्चत रुप से कह सकता हूँ की जो ऊपर बतायी विधि से आनापानसति ध्यान करेगा वो अपनी जनमो जनमो की यात्रा को इसी जनम मे पूर्ण कर लेगा ! बहुत लोग एक ,दो औरतीन साल मे अपनी यात्रा पूर्ण कर चुके है अब उनहे कोई फरक नी पडता की वो आज मरे या कल वो सदा सदा को दुखो से परे हो गये है हमे ईसी जीवन मे परम शाँति उपलब्ध होना है !

 

आनापानसति ध्यान करते समय एक अनुभव मुझे अक्सर होता है जो सभी से शेयर कर रहा हू मै जब भी ज्यादा देर ध्यान करता हू मतलब के दो घण्टे या ज्यादा तो एक ऐसी दशा आ जाता है जब बिल्कुल हल्कापन लगता है और मन शून्यता मे आ जाता है साँस एकदम ईतना छोटा की नासिका से निकल भी रहा है ईसका भी पता नही चलता है बहुत ही हल्का साँस हो जाता है तब जब ध्यान से उठता हू तो यदि आस पास शोर शराबा भी हो तो ऐसा लगता की मै कही दूर जँगल आदि एकान्त जगह मे हू और शोर शराबा कोसो दूर से आ रहा है अधिक ध्यान करने पर अक्सर ये भी अनुभव होता है की बाहर की आवाजे बिल्कुल कम कम हो जाता है भूल जाता हू की कहाँ बैठा हू बाद मे जब आँख खोलता तब याद आता की कहाँ बैठा हू ,एक बार पूर्णिमा के दिन ध्यान करते हुये मेरा साँस पर से भी ध्यान छुट गया ,उस पल कुछ देर बाद जब याद आया तो पता चला की मुछे कुछ भी भान नही था शायद यही समाधि का दशा है जब आप ध्यान कर रहे ये भी पता नही चलता और अपना भी बोध नही रहता ,ईस अनुभव से मै ये समझ पाया की क्यो ये कहा गया है की समाधि दशा मे ध्याता और ध्येय एक हो जाते है मै भी ध्यान मे आगे बढ रहा हू ईश्वर करे आप सब भी ध्यान मे खूब खूब आगे बढे उन्नति करे

 

आनापानसति ध्यान की खास बाते

ध्यान केवल मन को निरविचार करने तक ही सीमित नही जितना हम जानते है ये उससे भी अँनन्त गुना आगे की बात है

आनापानसति ध्यान मे विशेषरुप से कास्मिक ऊर्जा की खेती की जाती है ये खेती करने जैसा है हम प्रारम्भ मे प्राकृतिक श्वासो से यात्रा शुरु करते है हम जब प्राकृतिक श्वासो के साथ एक होते जाते है तो मन खाली होने लगता है आप एक घण्टा करोँगे तो थोडा विचार कम होँगे थोडी शाँति आती जायेगी फिर डेढ दो घण्टे लगातार अभ्यास करिये तो विचार और कम होँगे धीरे धीरे तीन घण्टे तक आयेँगे तो विचार और सूक्ष्म होँगे और आप बहुत शाँति पायेँगे पर हमे यही तक सीमित रहना है तो फिर रोज शाँति बडता जायेगा परँतु गर वहाँ तक जाना है रोमाँन्चकारी यात्राये करना है जैसे टेलीविजन आदि मे नारद मुनि आदि एक लोक से दूसरे लोको मे जाकर वहाँ भगवान से ज्ञान प्राप्त करते थे सीधे ही तो फिर आप को अभ्यास करना ही पडेँगा आप समय बडाते जाईयेँ तो तीन घण्टा चार घण्टा पाँच घण्टा बडाते जाईये जमकर ऊर्जा का खेती कीजिये और थोडे ही महीनो मे आप का दिव्य दृष्टि जाग्रत होने लगेगा आप को सिद्ध लोग जो आन्तरिक जगत मे रहते जैसे साई बाबा ,रमण ,देवी देवता आदि आदि आकर दिखने लगेँगे आप उनसे अपने प्रशन पूछ सकते वे आप को उत्तर देँगे टेलीपैथी मे सँवाद चलता है आप के सपने तक अर्थ वाले हो जायेँगे ,ऐसा बोला जाता है हमारे जनम के साथ कुछ ऐन्जल्स और हमारे गार्डियन भी हमे मिलते है और कभी कभी जो सहायताये आदि मिलती वे येही देते गर हम उनसे कनेक्शन जोड ले तो अपने विकास मे महत्पूर्ण प्रगति कर सकते है हमारी प्रगति से ईनकी भी आध्यात्मिक उन्नति होती है और ईनका भी उच्च लोको मे ट्रासफर होता रहता है ईनहे आप अपने पूवर्जो की दिव्य आत्माये कह सकते है ईसलिये आप के गलत कर्म ईनको भी ले डूबते है आप अचानक सूक्ष्म यात्राये करने लगते है अन्य लोको मे जाकर वहाँ के मास्टरर्स से सम्पर्क करके ज्ञान विज्ञान प्राप्त कर सकते है काफी लोगो ने गायत्री परिवार के सिद्ध सँस्थापक पडिँत राम शर्मा जी की किताबो मे ज्ञानगँज और सिद्धाशम आदि गुप्त सिद्ध स्थानो के बारे मे पढा होगा ये सब सम्भव है कोई भी अभ्यास करके वे सब रहस्यो का अनुभव कर सकता है विचार शक्ति बहुत पावरफुल हो जाती है आप के सोचने के पहले वे आवश्यकताये सिद्ध लोग खुद पूरा करते जाते ताकि आप आध्यात्मिक मार्ग पर बढते जाये ,खाने पीने की भी जरुरत नगण्य होती जाती ,अभी ऐसे हजारो साधक लोग है जो अपने घर बैठे बैठे हिमालय की यात्राये करते रहते ,सारे चक्र खुल जाते ,आपके सब शरीर शुद्ध हो जाते आप जब तक न चाहो कोई आप के शरीर से आप को अलग नी कर सकता ,ये बहुत सरल है और अभ्यास भी हर कोई सकता क्योकि करना कुछ नी होता न सीधा बैठना पडता थक जाओ तो सहारा ले लीजिये ,अनन्त यात्रा कीजिये

 अनमोल प्रेम

onkar kumar
I am a software enginner in an MNC with deep interest in spiritual stuffs . I have knowledge of healing such as Reiki , Prana voilet healing , Crystal healing etc .
I am Reiki Grand master , love meditation and inspire everyone to experience peaceful and blissful life .
It would be awesome if you would share your knowledge and experience . Thank you .