प्रश्‍न: क्‍या बिना गुरू के साधना कर सकते हैं ?

उत्‍तर: ध्‍यान एक ऐसी प्रक्रिया है जिसको कोई भी कर सकता है। यदि आपके पास गुरू ना हो तो भी आप ईश्‍वर को अपना गुरू या मार्गदर्शक मानकर साधना आरम्‍भ कर सकते है। यदि ईश्‍वर ने आपके लिये कोई गुरू नहीं निश्चित किया है तो वो स्‍वयं आपका मार्गदर्शन करेंगे। दुनिया में कोई गुरू ईश्‍वर ने आपके लिये निश्चित किया है मगर आप उनको नही जानते तो भी आप चिन्‍ता ना करें आप साधना प्रारम्‍भ करें, आगे बढें, समय आने पर वो गुरू स्‍वयं आपको ढूंढ लेंगे। आप गुरू को ढूढना चाहते है मगर वो आपको नही मिल रहे इसका मतलब है कि अभी आप इतने समर्थ नही हुये कि उनके आदेशों को समझ सकें उनका पालन कर सके, इसी लिये वो आपके सामने नही आ रहे। बस आप अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास कीजिये। अपनी गलतियों का अहसास कीजिये। कई लोगों के साथ जाने अन्‍जाने में आपने गलत व्‍यवहार किया है किसी के साथ एक पैसे की भी बेईमानी की, उसका द;@BFल दुखाया, उसको याद करके ईश्‍वर से माफी मांगिये और दुबारा ऐसा ना करने का प्रण लीजिये। आपके व्‍यवहार व विचारों में उत्‍कृष्‍टता आते ही वो किसी ना किसी माध्‍यम से आपको मिल जायेंगे। गुरू की खोज में आपको इधर उधर भाग दौड करने की जरूरत नही है। याद रखिये हमेशा गुरू अपने योग्‍य शिष्‍य को खोजता है शिष्‍य की इतनी सामर्थ्‍य नही कि समर्थ गुरू को ढूंढ सके।

 

साध्‍ाना में मौन
साधना में मौन का मतलब चुप रहना नहीे है। मौन चाहिये अपने अन्‍दर का, अपने मन का, अपने विचारों का। सप्‍ताह में एक दिन के मौन से कुछ नहीं होने वाला, कोई चमत्‍कार नहीं होगा और लोग भी हमको पागल और नौटंकीबाज कहेंगे। हम उनकी बातें सुनकर अन्‍दर ही अन्‍दर कोध्रित होगें, असल में उस दिन आप अपनी दुगनी शक्ति खर्च कर रहे है, क्‍योंकि आप उस दिन अन्‍दर ही अन्‍दर ये सोच रहे है कि जब बोलेेंगे तो इससे ये कहना है उससे वह कहना है इसने ऐसा कहा उसने वैसा कहा। उस समय आप कुछ नहीं कह रहे क्‍योंकि आपने उस दिन अपने आप को धोखा देने के लिये मौन व्रत धारण किया हुआ है, शारीरिक रूप से चुप है मगर अन्‍दर विचारों का तूफान चल रहा है। सप्‍ताह में 6 दिन बेसिरपैर की बातें करते रहें एक दिन मौन रख लिया अपने अहंकार को और पुष्‍ट कर लिया कि हमने अपने इष्‍ट पर अपने गुरू पर बहुत बडा अहसान किया और हम आज एक कदम और उसकी ओर बढाने में सफल हो गये। हम लोग दिन भर कार्य करने चलने फिरने से दस गुना ज्‍यादा शक्ति या प्राण ऊर्जा सोचने में खर्च करते हैं। कार्य रोक कर या बोलना छोडकर ऊर्जा नहीं बचाना है बल्कि सोचना बन्‍द करके बचाना है विचारों को रोक कर बचाना है। मतलब भर का बोलें कोई फर्क नहीं पडता। रेडियो टीवी समाचार आदि भी आजकल आदमी की प्राण ऊर्जा चूसने का सबसे अच्‍छा माध्‍यम है अगर वाकई साध्‍ाना में आगे बढना है तो ये सब छोडना होगा, दिन में 24 घन्‍टे अपने मन को साफ करने का प्रयास करना होगा। ना व्‍यर्थ बोलें ना देखें और ना सुने। अगर शारीरिक मौन रखने से ऊर्जा बचती और शक्तियां जाग्रत होती तो गूंगे लोगों के पास कितनी शक्तियां होती।

Neeraj Mittal