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यज्ञ का महत्व और साधना

अखण्ड ज्योति Dec 1958 |

 

अग्नि होत्रिणे प्रणुदे सपत्नश्र।

-अथर्व वेद 9/2/6

यज्ञ करने से शत्रु नष्ट हो जाते हैं। शत्रुता को मित्रता में बदल देने का सर्वोत्तम उपाय यज्ञ है।

सम्यंजोऽग्नि सपर्यत।

-अथर्व वेद 3/30/6

सबको मिलकर यज्ञानुष्ठान करना चाहिए। सामूहिक उपासना का महत्व असंख्य गुना अधिक है।

यज्ञं जनयुन्तु सूरयः

-ऋग्वेद 10/66/2

हे विद्वानों, संसार में यज्ञ का प्रचार करो। विश्व-कल्याण करने वाले साधकों में यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है।

ईजानाः स्वर्गं यान्ति लोकम्।

-अथर्व वेद 18/4/2

यज्ञ करने वाले को स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है। जिन्हें स्वर्गीय सुख प्राप्त करना अभीष्ट हो, वे यज्ञ किया करें।

प्राचं यज्ञं प्रणतया स्वसाय।

-ऋग्वेद 10/101/2

प्रत्येक शुभ कार्य यज्ञ के साथ आरंभ करो। यज्ञ के साथ आरम्भ किये हुए कार्य सफल और सुखदायक होते हैं।

सर्वेषाँ देवानाँ आत्मा यद् यज्ञः।

-शतपथ 12/3/2/1

सब देवताओं की आत्मा यह यज्ञ है। यज्ञ करने वाले देवताओं की आत्मा तक पहुँचते हैं।

अयज्ञियो हत वर्चो भवति।

-अथर्व वेद

यज्ञ रहित मनुष्य का तेज नष्ट हो जाता है। यदि तेजस्वी रहना है तो यज्ञ करते रहना चाहिए।

भद्रो नो अग्नि राहुतः।

-यजुर्वेद 15/32

यज्ञ में दी हुई आहुतियाँ कल्याणकारक होती है। जो अपना कल्याण चाहते हैं वे यज्ञ किया करें।

मा सुनोतेति सोमम्।

-ऋग्वेद 2/30/7

यज्ञानुष्ठान की महान उपासना बन्द न करो। जहाँ यज्ञ बन्द हो जाते हैं वहाँ से सुख-शाँति चली जाती है।

कस्मैत्व विमुँचति तस्मैत्वं विमुँचति।

-यजुर्वेद

जो यज्ञ को त्यागता है उसे परमात्मा त्याग देता है। जिन्हें परमात्मा का अनुग्रह अभीष्ट हो, वे यज्ञ करना त्यागें।

अस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही

-ऋग्वेद 1/3/8/8

Source : http://literature.awgp.org/akhandjyoti/edition/1958/Dec/1

साधना एवं यज्ञ का सूक्ष्मीकरण

अखण्ड ज्योति Jul 1984

यजुर्वेद में “यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म” एक उक्ति आती है, जिसका अर्थ होता है- यज्ञ संसार के श्रेष्ठतम कार्यों में से एक है। शास्त्रकार बताते हैं कि जहाँ गायत्री ज्ञान मार्ग के माध्यम से व्यक्ति को अज्ञान की तमिस्रा से हटा कर उसे बन्धन मुक्ति की ओर ले जाती है, वहाँ यज्ञ देव पूजन के माध्यम से भाव योग की, संगतिकरण के माध्यम से ज्ञानयोग की एवं दान के माध्यम से कर्मयोग की एक समग्र साधना का प्रतीक है। यज्ञ को ही क्यों श्रेष्ठ माना गया, इसका कारण जाँचने पर पता चलता है कि इस पुनीत प्रक्रिया में कारण शक्ति का प्रयोग होता है। स्थूल दृश्यमान है, सूक्ष्म ऐसा अदृश्य जो उपकरणों के माध्यम से ही जाना जा सके एवं अन्तिम कारण वह जो बुद्धि के अतिरिक्त अन्य किसी माध्यम या उपकरण से परखा न जा सके। यज्ञ में यही होता है। कारण शक्ति को उभारा और प्रयुक्त किया जाता है। उसके बिना तो पदार्थ मात्र जड़ वस्तु है। इसीलिए यज्ञ को श्रेष्ठ तो कहा ही गया है, वरिष्ठ भी माना गया है। यज्ञ की प्रशंसा में ऐसे अनेकों संदर्भ मिलते हैं जो यज्ञाग्नि की वरिष्ठता का प्रतिपादन करते हैं।

मीमांसाकार ने कहा है कि यज्ञ के परिणाम स्वरूप एक ऐसा सूक्ष्म संस्कार उत्पन्न होता है, जो कभी विनष्ट नहीं होता। यदि यजन कर्ता ने समस्त व्रत-अनुबंधों को निभाया है तो उसका परिणाम देवत्व की प्राप्ति के रूप में मिलकर ही रहता है। मीमांसाकार इस सूक्ष्म संस्कार को अपूर्व या अदृष्ट नाम दिया है। यज्ञ क्रिया से समुत्पन्न यह अपूर्व रूप सूक्ष्म संस्कार व्यक्ति को समयानुसार महत्वपूर्ण लाभों की प्राप्ति कराता है। ब्राह्मणादि ग्रन्थों में यज्ञ का श्रेष्ठतम कर्म के रूप में इसी कारण उल्लेख हुआ है।

यज्ञ का कारण शक्ति को सूक्ष्मीकरण के संदर्भ में कुछ उदाहरणों द्वारा समझा जा सकता है। प्याज के छिलके के भीतर, केले के तने के भीतर एक के भीतर एक परत आती चली जाती है। वस्तुओं एवं प्राणियों के भीतर भी इस आधार पर परतें बनती हैं। मनुष्य के तीन शरीर हैं- स्थूल जो दिखाई पड़ता है, सूक्ष्म-अशरीरी- जिसके अस्तित्व के रूप में भूत-प्रेतों के अनेकों प्रमाण मिलते हैं। कारण देव शरीर है। यह तीनों एक से अधिक शक्तिशाली हैं किन्तु साथ ही सूक्ष्मतम भी।

पदार्थ के भी तीन शरीर होते हैं। तुलसी का मोटा स्थूल रूप मानवी जीवनचर्या में दैनन्दिन दिखाई पड़ता है। इस रूप में वह मक्खी, मच्छरों को भगाती, वातावरण संशोधित करती है। सूक्ष्म में वह और भी प्रखर होकर मनोरोगों को मिटाती है। चरणामृत-पंचामृत में मिल जाने पर वह मन में पवित्रता भर देती है, देव कर्मों के प्रयोजन में प्रयुक्त होती है। रासायनिक संरचना की दृष्टि से तुलसी व करंजवा मिलते जुलते हैं, पर सूक्ष्म एवं कारण स्थितियों में भिन्नता स्पष्ट मालूम होती है।

यज्ञ में चार आधार हैं और वे चारों ही सूक्ष्म बनाने पड़ते हैं। पहला ‘व्यक्ति’, दूसरा ‘अग्नि’, तीसरा ‘वाणी’, चौथा ‘चरु’। यदि ये चारों ही स्थूल रूप में प्रयुक्त किये जायें तो उनका यज्ञीय प्रयोजन पूरा न होगा और जो चमत्कारी परिणाम वर्णित किया गया है। वह हस्तगत न हो सकेगा।

यह प्रक्रिया में चार ऋत्विज् गण भाग लेते हैं- होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा। यह चारों किसी भी व्यक्ति का नामकरण करके नियुक्त नहीं कर दिये जाते। वरन् उन्हें अमुक समय तक अमुक स्तर का त्याग, तप करना पड़ता है। यदि तप साधना का उपक्रम न अपनाया गया हो तो वह प्रभाव उत्पन्न न हो सकेगा जो यज्ञ की सूक्ष्म एवं कारण शक्ति उभारने हेतु अभीष्ट है प्रथम होता ज्ञानकाण्डी ऋग्वेद अनुशासनों पर चलने वाला होता है। अध्वर्यु कर्मकाण्डी यजुर्वेदी एवं उद्गाता गायक सामवेदी होता है, साधारण गाने वाला नहीं वरन् भक्ति भाव का धनी समर्पित साधक। ब्रह्मा चतुर्वेदों का जानकार अथर्ववेदी जो सारी प्रक्रिया का नियमन करने वाला, प्रबन्ध निदेशक, व्यवस्था संयोजक है। यह वर्णन यहाँ व्यक्तित्व के सूक्ष्मीकृत उच्चस्तरीय स्वरूप को दर्शाने के लिए किया गया जो कि याजक गणों ऋत्विजों को हस्तगत करना पड़ता है।

यज्ञ जैसे श्रेष्ठतम कर्म के चारों ऋत्विज् गण साधक स्तर के होने पर ही उस प्रयोजन को पूरा कर पाते हैं। दशरथ द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ सम्पन्न होना था। उसके लिये जिस स्तर के अध्वर्यु की अपेक्षा थी, वह शृंगी ऋषि के माध्यम से पूरा हुआ। इसके पूर्व उसके सभी प्रयास असफल रहे थे। संयम-तपोबल के धनी ऋत्विज् के ऋषि द्वारा यह कार्य सम्पन्न होते ही अभीष्ट कार्य पूरा हो गया। यह व्यक्तित्व के सूक्ष्मीकृत कारण रूप की फलश्रुति है।

ऋत्विजों के बाद यज्ञाग्नि का प्रसंग आता है। यज्ञाग्नि पवित्र है, उसे अभिमन्त्रित किया जाता है। माचिस की तीली से अंगीठी जलाने अथवा हुक्का गुड़-गुड़ाने के लिये अग्नि सुलगाने से वह प्रयोजन पूरा नहीं होता, यों ही आहुतियाँ देना आरम्भ नहीं कर दी जातीं। अग्नि मन्त्र शक्ति द्वारा अभिमन्त्रित कर मन्थन के माध्यम से प्रकट की जाती है। अखण्ड दीप में जो अग्नि सतत् ज्वलनशील रहती है, वह यज्ञाग्नि का ही एक रूप है।

आहुति दी गयी सामग्री को अग्नि ऊपर ले जाती है एवं वायु उसे अंतरिक्ष में ले जाती है। भूमि पर होम होता है लेकिन यज्ञाग्नि की ऊर्ध्वीकरण की शक्ति उसे अंतरिक्ष में तथा फिर अग्नि के द्वितीय किन्तु अद्वितीय रूप विद्युत ऊर्जा के माध्यम से और भी ऊपर ले जाता है। आहुति दी गयी हवि, अग्नि और विद्युत से ऊँची उठती हुई स्थूल से सूक्ष्मतम होती हुई अपने दिव्य रूप को प्राप्त होती है। अपने इस सूक्ष्मीकृत रूप में यज्ञाग्नि न केवल मनुष्य, प्राणी जगत, वनस्पति जगत को प्रभावित करती है वरन् समग्र पर्यावरण एवं परोक्ष वातावरण का नियमन, संशोधन एवं अनुकूलन का प्रयोजन पूरा करती है। यज्ञ ऊर्जा मात्र अग्निहोत्र से उत्पन्न ताप नहीं, अपितु एक अति सूक्ष्म सामर्थ्य सम्पदा है जो व्यक्ति एवं समग्र वातावरण पर प्रभाव डालकर उन्हें शक्ति सम्पन्न बनाती है।

तीसरा पक्ष मन्त्र शक्ति अथवा वाणी का है। कोई भी संस्कृत पढ़ा व्यक्ति, संस्कृत भाषा में सही-सही उच्चारण कर सकता है। पर इससे क्या? इतने भर से तो प्रयोजन पूरा नहीं होता। जो कथा शुकदेव जी ने परीक्षित को सुनाई, वह कोई अन्य ऋषि से सम्भव नहीं हो पाती। जबकि उनके पिता मन्त्रों के दृष्टा माने जाते थे। कोई भी व्यक्ति अक्षरों का स्मरण कर, नाम जप द्वारा ऋषि या दृष्टा नहीं कहा जा सकता। इसलिये कुछेक अपवादों के अतिरिक्त पुरातन काल में हर ऋषि कुछ चुने हुए मन्त्रों के प्रवीण पारंगत एवं दृष्टा कहे जाते थे। इस सम्बन्ध में गायत्री मंत्र के ऋषि-दृष्टा विश्वमित्र का उल्लेख किया जा सकता है, जिनका नाम विनियोग प्रसंग में लिया जाता है।

ज्ञान एवं कर्म की अपनी सीमा है किन्तु भाव व उदात्तीकरण जब वाणी के माध्यम से मन्त्रों द्वारा होता है। तो वह मानवी काया के अन्तराल को ही नहीं, सारे वातावरण को झकझोर डालता है यज्ञ में वाणी का प्रयोग सूक्ष्म रूप में सामगान के रूप में होता है। भावप्रधान संगीत लहरी में गायी गयी ऋचाएँ सारे शरीर को स्पन्दित कर डालती हैं, साथ ही सारा वायुमण्डल आन्दोलित हो उठता है। सामवेद की इस प्राणदायिनी मधुर रस वर्षा को छान्दोग्योपनिषद् ने इस प्रकार कहा है- “वाचः ऋक् रसः, ऋचः साम रसः।”

यह देव संस्कृति का एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक पक्ष है कि वाक् शक्ति के विस्तृतीकरण हेतु यज्ञाग्नि का एम्पलीफायर के रूप में प्रयोग होता है। परिष्कृत वाणी जब विशिष्ट व्यक्ति के मुख से विशिष्ट प्रयोजन के लिये निकलती है तो मिसाइल का काम करती है। शब्द शक्ति का यह सूक्ष्मीकृत रूप आज अल्ट्रासोनिक तरंगों के रूप में विभिन्न रोगों के निदान एवं चिकित्सा कार्य में प्रयुक्त होता रहा है। किन्तु शाप-वरदान तथा परामर्श-सत्संग के रूप में यह चिरपुरातन काल से प्रयुक्त होता रहा है। ऐसे शब्दबेधी बाण तो आज के युग में देखे नहीं गए जो लक्ष्य बेधकर उसी स्थान पर वापस लौट आयें किन्तु इस सिद्धान्त के सम्बन्ध में वैज्ञानिक आश्वस्त हैं कि शक्ति सम्पन्न विचार शब्द क्वाण्टा के समुद्र में प्रकाश की गति से दौड़ते हैं एवं लक्ष्य सिद्धि के बाद वापस लौट आते हैं। लेसर व मेसर के माध्यम से वैज्ञानिकों ने वाक् की इस सूक्ष्म शक्ति को ही सिद्ध किया है।

चौथा प्रकरण हविष्य एवं चरु का है। स्थूलतः यह पदार्थ परक होते हैं किन्तु यज्ञ प्रक्रिया में इनकी कारण शक्ति को उभारा जाता है। उपयुक्त याजक द्वारा ही हविष्य का संग्रह, पवित्रीकरण एवं संस्कारीकरण किया जाता है। यज्ञाग्नि में पकाये गये चरु में ही उन अंश का समावेश होता है जो आनुवाँशिकी से लेकर कर्म प्रारब्ध के सूक्ष्म संस्कारों पर प्रभाव डालते हैं। होम किया जाने वाला पदार्थ कितना पवित्र है, शुद्ध है, उसी पर उसकी कारण शक्ति का प्रकटीकरण निर्भर है। पदार्थ तो अपने स्थूल रूप में मात्र एक वनस्पति, खाद्यान्न मेवा अथवा दुग्ध रूप में है। लेकिन यज्ञाग्नि का स्पर्श उसे परिवर्धित कर डालता है। जिस प्रकार प्राणाग्नि का उद्दीपन कुण्डलिनी जागरण के रूप में तथा साधना द्वारा योगाग्नि का प्रकटीकरण ब्रह्मतेजस् के रूप में देखा जाता है। ठीक उसी प्रकार यज्ञ प्रयोजन में प्रयुक्त होने वाली हर सामग्री की परिष्कृति चमत्कारी होती है। शरीर रोग एवं मनोविकारों के निवारण तथा जीवनी शक्ति सम्वर्धन में इनकी भूमिका को भली-भांति देखा जा सकता है। चरु जो कि मेवे, खाद्यान्न, दुग्ध, शर्करा का सम्मिश्रण होता है एवं यज्ञाग्नि में पकाया, संस्कारित किया जाता है विशेष रूप से महत्व दिया जाना चाहिए क्योंकि इसके प्रभाव न केवल जीवकोश वरन् डी.एन.ए., जीन्स जैसे सूक्ष्मतम घटक पर पड़ते हैं।

इस प्रकार ऋत्विज, यज्ञाग्नि, वाक् शक्ति एवं हविष्य चरु में चारों ही यजन प्रक्रिया के ऐसे प्रसंग हैं जिनमें सूक्ष्मीकरण का प्राधान्य है। वस्तुतः यज्ञ एक ज्वलन प्रक्रिया भाव नहीं है वरन् चारों तत्वों की कारण शक्ति को उभारने की एक विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है। इतना न किया जाय तो यज्ञ प्रयोजन में अभीष्ट सफलता नहीं प्राप्त होती।

यहां यज्ञ के उदाहरण से हम ने यह समझाने का प्रयत्न किया है कि आत्मबल सम्वर्धन एवं शक्ति संचय हेतु सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया कैसे सम्पादित की जाती है एवं प्राणशक्ति का एकत्रीकरण, ऊर्ध्वगमन, बहुलीकरण कर कैसे व्यक्ति अपनी साधना तपश्चर्या से अनगिनत व्यक्तियों को लाभ पहुँचा सकता है। मन्त्र योगी को भी ऋत्विजों की तरह कुछ साधना अनुबन्धों का निर्वाह करना पड़ता है। उसे सीमित समय में सीमित विषय वार्ता का अभ्यास करना होता है। अभीष्ट प्रसंग के अतिरिक्त निरर्थक वार्ता न हो। जहाँ तक सम्भव हो, मौन-एकाकी तप साधना में ही निरत रहा जाय।

किसी की छाया सिद्धि करनी है तो अपनी निज की छायाओं में से जिनकी सिद्धि हस्तगत करनी है, उसी स्तर पर अभ्यास करना होता है। जिस प्रकार स्थूल शरीर को स्नान, शयन, भोजन, व्यायाम आदि करना होता है उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर को साधना उपचारों का पोषण देना होता है। उसे जिस प्रयोजन के लिये अभ्यस्त करना होता है, वैसी ही तप साधना में स्वयं को नियोजित करना होता है।

समाधिस्थ योगी को अपने स्थूल शरीर को गहरी निद्रा की स्थिति में ले जाना पड़ता है और उस स्तर का अभ्यास करना होता है जिसकी कि समाधि अभीष्ट है। षट्चक्र, पंचकोशों, तीनों ग्रन्थियों- इन सबको एक साथ साधा नहीं जा सकता। इनमें से सभी समय साध्य, जटिल एवं भिन्न-भिन्न उपक्रमों से की जाने वाली साधनाएँ हैं। जिन्हें प्राथमिकता देनी हो, सूक्ष्म शरीर उन्हें ही पहल देता है एवं क्रमिक व्यवस्थानुसार शेष को आगे के लिए छोड़ देता है। जिस प्रकार व्यवसाय अनेकों हैं, उसी प्रकार योग के प्रसंग एवं उद्देश्य भी अगणित हैं। साधक को शास्त्र निर्देशानुसार विभिन्न अभ्यासों की प्रयोजन विशेषतानुसार कम व्यवस्था निर्धारित करनी होती है। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण चरण साधना का सूक्ष्मीकरण है। जिनमें प्रत्यक्ष क्रियाकलापों पर रोकथाम कर व्यक्तित्व वाणी, प्राणाग्नि एवं आहार आदि के कारण रूप को उभारना-सुनियोजित करना होता है। यज्ञ प्रक्रिया से साधना के सूक्ष्मीकृत रूप का कितना साम्य है, इसे स्पष्ट देखा जा सकता है।

Source : http://literature.awgp.org/akhandjyoti/edition/1984/Jul/25

onkar kumar
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