यज्ञ प्रक्रिया, दिव्य अनुशासन एवं यज्ञ−संसद

 

अखण्ड ज्योति Nov 1992 |

यज्ञ को भाव विज्ञान, मनोविज्ञान, मंत्र विज्ञान, पदार्थ विज्ञान, एवं क्रिया विज्ञान का एक अद्भुत संगम कहा जा सकता है। दिव्य चेतना, सृष्टिगत परमात्म चेतना के साथ आदान−प्रदान की क्षमता के कारण यज्ञ को दिव्य द्वार भी कहा गया है। इसीलिए इसकी हर क्रिया एवं भावना आदि के साथ दिव्य अनुशासन जोड़ कर रखे जाते हैं। उन दिव्य अनुशासनों का स्मरण बनाये रखने के लिए यज्ञशाला में उनके प्रतीक स्थापित किए जाते हैं, तथा अनुशासित क्रम से सारी प्रक्रिया के संचालनार्थ यज्ञ संसद भी नियुक्त की जाती है।

वर्तमान प्रसंग में अश्वमेध यज्ञों के साथ सभी आवश्यक दिव्यानुशासन जोड़े गये हैं। सूक्ष्म स्तर की व्यवस्था पर इस अंक में पूर्व पृष्ठों पर पर्याप्त प्रकाश डाला जा चुका है। दृश्य प्रतीकात्मक स्वरूप बनाने में भी देशकाल के अनुरूप शास्त्रीय प्रक्रिया अपनायी जा रही है।

प्रतीकों की स्थापना

अश्वमेध की सहस्रकुण्डीय यज्ञशाला को दिव्य, चिन्हों, चक्रों एवं देव विग्रहों से अलंकृत किया जा रहा है। कुछ महत्वपूर्ण स्थापनाएँ इस प्रकार हैं−

यज्ञशाला की चारों दिशाओं में चार दिव्य द्वार बनाये जाते हैं। यह केवल देव प्रयोजनों के लिए होते हैं, जनोपयोग, के लिए नहीं। इनमें तोरण, शूल एवं शंख चक्र, गदा, पदम आदि चिन्ह आँकित रहते हैं। पूर्व में लाल रंग में शंख, दक्षिण में काले रंग में चक्र, पश्चिम में सफेद रंग में गदा तथा उत्तर में पीले रंग में पद्म अंकित होता है। इन चारों द्वारों पर आठ देव प्रहरी, जय−विजय, भद्रक−सुभद्रक , आदन्द−विश्वरूप एवं ध्रुव−सुप्रसन्न अंकित होते हैं।

आठों दिशाओं में विभिन्न देवशक्तियों की प्रतीक पताकाएँ स्थापित की जाती हैं। उन पर सम्बन्धित देवशक्तियों के वाहन अंकित होते हैं।

− पूर्व में इन्द्र देवता का वाहन हाथी सफेद रंग से अंकित होता है। अग्नि कोण में अग्निदेव का वाहन अज सफेद रंग से अंकित होता है। दक्षिण में यम देवता का वाहन महिष लाल रंग में−नैऋत्य में दुर्गा का वाहन सिंह सफेद रंग में, पश्चिम में वसु का वाहन मकर धूम्र रंग में, वायव्य में चन्द्र का वाहन हरिण काले रंग में, उत्तर में सूर्य का वाहन अश्व स्वर्णिम रंग में तथा ईशान में शिव का वाहन वृषभ सफेद रंग में अंकित होता है।

− इसी प्रकार ईशान एवं पूर्व के मध्य में ब्रह्म का वाहन हंस और नैऋत्य एवं पश्चिम के बीच अनन्त देव का वाहन गरुड़ अंकित पताकाएँ स्थापित की जाती हैं।

* आठों दिशाओं में आठ दिग्पालों के प्रतीक हाथी स्थापित किये जाते हैं। आकाश एवं पाताल दिशा के दिग्पालोँ की स्थापना अदृश्य होती है।

* विभिन्न दिशाओं में विभिन्न आकृति वाले यज्ञ कुण्डों की रचना का विधान पूर्व लेखों में दिया जा चुका है।

* आठ दिशाओं में सप्त ऋषि तथा आठवीं अरुन्धती की मूर्तियों का निर्धारण है। उत्तर में गौतम, ईशान में भारद्वाज, पूर्व में विश्वामित्र, आग्नेय में कश्यप, दक्षिण में जमदग्नि, नैऋत्य में वशिष्ठ, पश्चिम में अत्रि तथा वायव्य में अरुन्धती की स्थापना की जाती है।

* यज्ञशाला में देव वेदियों की स्थापना का क्रम भी निर्धारित है। सर्वतोभद्र प्रमुख देवमं− के सामने पूर्व दिशा में। उसके दोनों ओर षोडश मातृका एवं द्वादश विनायक चक्र।

− तत्व वेदियों में आकाश तत्व का प्रतीक स्वास्तिक देवमंच के पास रखा जाता है। अग्नि कोण में अग्नितत्व, नैऋत्य में पृथ्वी तत्व, वासुतत्व, तथा ईशान में जल तत्व की वेदियों की स्थापना होती है।

− यज्ञशाला के मध्य में नवग्रह चक्र, ईशान में पंचोंकार वेदी, वायव्य में क्षेत्रपाल चक्र, अग्नि कोण में योगिनी चक्र, नैऋत्य में वास्तुवेदिका, की स्थापना की जाती है।

− यह सभी स्थापनाएँ मात्र श्रृंगार नहीं है, इनमें सन्निहित प्रेरणाओं एवं शक्तियों को यज्ञीय कर्मकाण्ड के बीच उभारा जाता है। यज्ञीय कर्म और याजकों के मनोभाव−विचार आदि उसी के अनुरूप गढ़े जाते हैं।

अनुशासन की धुरी यज्ञ संसद

यज्ञ का संचालन स्थूल एवं सूक्ष्म अनुशासनों का निर्वाह करते हुए हो, इसके लिए सक्षम विशेषज्ञ नियुक्त किए जाते हैं। उस व्यवस्था को यज्ञ संसद की संज्ञा दी जाती है। यज्ञ संसद के प्रमुख दायित्व इस प्रकार होते हैं।

यज्ञाचार्य− आचार्य को, रुद्रयामल में यज्ञ का सर्वाध्यक्ष कह गया है। किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति किये जाने वाले यज्ञ के लिए तदनुकूल क्षमता सम्पन्न आचार्य की खोज की जाती थी। आचार्य को यज्ञीय कर्मकाण्ड की सभी धाराओं का ज्ञान तो होता ही था, कार्य की गंभीरता के अनुरूप तप−शक्ति का भंडार भी होता था। तप शक्ति के आधार पर ही देव शक्तियों को आकर्षित−आवाहित करके उद्देश्य के अनुरूप सूक्ष्म प्रवाह पैदा करना संभव होता था।

राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ की कथा सर्व विदित है। महर्षि विशिष्ट उन दिनों ऋषियों में सर्वाधिक सम्माननीय थे, किन्तु उद्देश्य की पूर्ति के लिए उपयुक्त तपशक्ति सम्पन्न युवा ऋषि श्रृंग ऋषि को उन्होंने उस यज्ञ का आचार्य बनाया था। उनकी तपशक्ति के संयोग से ही वह यज्ञ इतना श्रेष्ठ फलदायी बन सका था।

आचार्य में ब्रह्मांडीय दिव्यधाराओं के साथ संगति बिठाने की क्षमता होती थी। वे जिस देवता का आवाहन करते थे, वे देवता यज्ञ में उपस्थित होते थे, जिनके लिए आहुति समर्पित करते थे, वह उन तक पहुँचती थी और स्वीकार होती थी। जनमेजय के सर्प यज्ञ में आत्मरक्षा के लिए तक्षक इन्द्रासन से जा लिपटा था। यह पता लगने पर इन्द्र सहित तक्षक की आहुतियाँ डाली गयीं। आहुतियों के प्रभाव से इन्द्रासन सहित तक्षक उस ओर खिंच चला। तब इन्द्र ने उसे अपने आसन से बलपूर्वक अलग किया था।

यज्ञ में आचार्य का वरण बहुत विचारपूर्वक का जाता रहा है। वर्तमान यज्ञ वशिष्ठ, अरुन्धती की तरह सक्षम ऋषियुग्म पूज्य गुरु देव एवं वन्दनीया माताजी के संरक्षण एवं मार्गदर्शन में होंगे।

ब्रह्म−यह आचार्य के बाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण पद होता है। ऋत्विक् एवं यजमानादि के समस्त कार्यकलापों का निरीक्षण तथा उन्हें भली प्रकार चलाने का दायित्व ब्रह्म का होता है। उनके तीन सहायक होते हैं−

(1) ब्रह्मणाच्छाँसी (निर्देशों का पालन कराने वाला) (2) आग्नीध्र − यज्ञाग्नि तथा आहुति आदि का संयोजक (3) पोता (स्वच्छता−पवित्रता का दायित्व वहन करने वाला)

होता− देवताओं का आवाहन करने वाले प्रधान पुरोहित स्वागताध्यक्ष। इनके भी तीन सहायक प्रशास्ता, अच्छावाक एवं ग्रावस्तुत होते हैं।

अध्वर्यु− यज्ञीय क्रियाओं का सुसंचालन करने वाला, सम्पूर्ण यज्ञीय विधि−विधान का ज्ञाता। इनके तीन सहयोगी प्रतिप्रस्थाता, नेष्ट एवं उन्नेता कहे जाते हैं।

उद्गाता− यज्ञ में देव स्तुतियों, गेय मंत्रों के विशेषज्ञ।

इनके तीन सहयोगी प्रस्तोता, प्रतिहर्ता एवं सुब्रहमण्यम होते हैं।

सदस्य− विभिन्न वेदियों के निकट बैठकर यज्ञीय कार्य का निरीक्षण करते हुए याजकों द्वारा होने वाली चूकों का निवारण करने का दायित्व इनका होता है।

याजक− साधना द्वारा अंतःकरण में यज्ञीय भाव जाग्रत करने वाले भावनापूर्वक आहुतियाँ समर्पित करने वाले याजक होते हैं।

श्रद्धा की प्रमुखता

यज्ञ कर्म में श्रद्धा सहित ही हर कार्य किया जाने का निर्देश शास्त्रों ने दिया है उसके बिना यज्ञ−कर्म निष्प्राण हो जाता है।

‘श्रद्धया सत्यमाप्यते’ श्रद्धा से ही सत्य की प्राप्ति होती है, कहकर शास्त्रों ने श्रद्धा सहित कर्म का आदेश दिया है−

गीताकार का कथन है:−

अश्रद्धया हुतं द्रव्यं तपस्तप्तंकृतं चतत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नोइह॥

अर्थात्−’अश्रद्धा से हवन, दान, तप, अथवा जो कुछ कर्म किया जाता है उसे ‘असत्’ कहते हैं। हे पार्थ! असत्कर्म का फल न तो परलोक में और न इह लोक में ही हितकर होता है।’

अत्रिस्मृति (146) में कहा गया है कि −

अश्रद्धया च यद् दन्तं विप्रेऽग्नौ दैविकेक्रतौ। न देवास्तृप्तिमायान्ति दातुर्भवति निष्फलम्॥

‘इष्ट देवता की प्रीति के लिये अनुष्ठित यज्ञ में ब्राह्मण रूपी अग्नि के लिये (ब्राह्मण और अग्नि के लिए) जो दक्षिणा आदि अश्रद्धा से अर्पण की जाती है उससे देवता को तृप्ति नहीं होती। दाता का वह दक्षिणा आदि द्रव्य निरर्थक ही जाता है।’

मत्स्यपुराण−के अनुसार श्रद्धाहीन यज्ञों से राजा और राष्ट्र दोनों की भयंकर क्षति होती है यथा −

शान्तिमंगल होमेषु नास्तिक्यं यत्र जायते। राजा वा म्रियते तत्र संदेशों वा विनश्यति॥ −(239-11)

शान्ति, मंगल तथा होम कार्यों में जहाँ पर श्रद्धाहीनता से उत्पन्न नास्तिकता का साम्राज्य रहता है, वहाँ के राजा ताकि उस देश का विनाश होता है। यही कारण है कि यज्ञ के पूर्व याजकों की श्रद्धा का परिष्कार एवं संवर्धन करने वाली साधनाएँ करायी जाती हैं। यज्ञ के समय उन प्रतीकों की स्थापना जगह−जगह की जाती है, जिसे देखकर याजकों की श्रद्धा उमड़े। यज्ञ संसद भी अनुशासन एवं संचालन में श्रद्धा को लक्ष्य करके ही सारे कार्यों का सम्पादन करते−कराते हैं।

Source : http://literature.awgp.org/akhandjyoti/edition/1992/Nov/25

onkar kumar
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