साधना में शीघ्र सफलता के लिये आवश्‍यक शर्ते

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सार्थक उपासना के मर्म

उपासना में मन स्वाभाविक रूप से लगे तथा अंतरंग क्षमताओं के संयोग से साधक उसका अधिक लाभ उठा सके, इसके लिये कुछ नियम हैं। तीन महत्व पूर्ण नियमों का उल्लेख यहाँ किया जाता है। प्रथम उपासना की सुनिश्चित मात्रा। उपासना अन्तःकरण का आहार, उसके व्यायाम जैसी है। व्यायाम अथवा आहार का क्रम कभी अधिक कभी कम रहे तो उसका ठीक ठाक लाभ नहीं मिल सकता है। अपनी शक्ति एवं रुचि के अनुसार न्यूनतम मात्रा निश्चित करके उन्हें नियमित रूप से प्रारम्भ किया जाय तथा फिर क्रमशः बढ़ाया जाय तो निश्चित रूप से उल्लेखनीय लाभ प्राप्त किया जा सकता है। उपासना के संबंध में भी यही है। प्रारम्भ में थोड़ी ही सही नियमित उपासना प्रारम्भ की जाय। रुचि बढ़ने के साथ-साथ उसकी मात्रा बढ़ाई जाय, यही उचित है।

दूसरा नियम है नियत समय। नियत समय पर जो भी कार्य लगातार किये जाते है, उनसे मनुष्य में विशेष जागरूकता उत्पन्न हो जाती है। भोजन के नियमित समय पर भूख लग आना, नशे का समय होते ही तलब लगना आदि इसके प्रमाण हैं। नियत समय पर नित्य उपासना करने से शरीर के अवयवों से लेकर अन्तःचेतना की परतों तक उस समय उपासना के अनुकूल एक लहर पैदा होती है, जो साधक को उपासना में तल्लीन होने में अत्यधिक उपयोगी सिद्ध होती है।

तीसरा नियम है निश्चित स्थान। पूजा का स्थान निश्चित रखना भी बड़ा लाभदायक है। हर क्रिया के समय शरीर से विशेष तरह के विकिरण उत्पन्न होते हैं। उनके आसपास का क्षेत्र प्रभावित संस्कारित होता रहता है। उसके प्रभाव से उसी प्रकार की धारायें सूक्ष्म जगत में भी आकर्षित होकर वहाँ एकत्रित होती हैं। जहाँ एक ही प्रकार की प्रक्रिया लम्बे समय तक चलती रहती है, वहाँ उस तरह के सूक्ष्म संस्कार अधिक सबल हो जाते हैं। तीर्थों की स्थापना इसी आधार पर होती रही है। निश्चित पूजा पाठ भी घर के अन्दर एक तरह का तीर्थ स्थल बन जाता है। जहाँ पहुँचते ही मनुष्य में दैवी प्रेरणा प्रवाह जाग्रत होने लगता हैं। व्यक्तिगत साधना नहीं बन पड़े तो मानसिक रूप से उसकी पूर्ति कर लेनी चाहिए। मजबूरी में जितनी उपासना छूट जाय उसे बाद में पूरा कर लेना चाहिए। उस तरह से की गयी उपासना सामान्य की अपेक्षा अनेक गुनी फलदायिनी सिद्ध होती हैं।

पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

Neeraj Mittal