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10 दिवसीय विपासना ध्यान कोर्स का अद्भुत अनुभव

aniwheel-विपासना

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मैं काफी समय से स्व० श्री सत्य नारायण गोयंका जी के द्वारा करवाए जाने वाले दस दिवस के आवासीय कोर्स के बारे में सुनता आ रहा था और अब जाकर इसे स्वयं करने का मौका मिला . मेरा कोर्स इंदौर के धम्म मालवा विपासना ध्यान केंद्र पे 6 दिसम्बर को शुरू होकर 17 दिसम्बर को सुबह समाप्त हुआ | इस कोर्स में हर दिन दस घंटे क्रमबद्ध तरीके से ध्यान का कार्यक्रम होता है , जिसमे साधक सुबह ४ बजे से रात के 9 बजे तक नियमों का पालन करता है . नियम बड़े कठिन हैं पर साधना के लिए अति आवश्यक भी , जैसे की 10 दिनों का पूर्ण मौन या आर्य मौन . आर्य मौन का मतलब बोलना नहीं , आखें नहीं मिलानी और इशारे से भी बात नहीं करना होगा , नजरें निचे रखनी हैं . मोबाइल और मूल्यवान वस्तुएं प्रथम दिन ही जमा हो जाते हैं . इसका मतलब दस दिनों के लिए दुनिया की गतिविधिओं से से कट जाना होता है . आप अपने घर पर केंद्र का नंबर दे सकते हैं , जिससे के बहुत जरूरी होने पे आपको सुचना दी जा सके | रहने के लिए अकेला कमरा दिया जाता है , बाथरूम साथ लगा होता है जिसमे गर्म / ठन्डे पानी की व्यस्था रहती है | सुबह नाश्ता , दोपहर भोजन और शाम में हल्का नाश्ता दिया जाता है , रात में भोजन नहीं होता | महिला पुरुष के रहने की व्यवस्था अलग अलग होती है , यहाँ पे हर तरह की व्यवस्था स्वयंसेवक निशुल्क सेवा देकर करते हैं | ये स्वयंसेवक हमारे जैसे ही लोग होते हैं जिन्होंने कभी दस दिनों का शिविर करके अपना कल्याण साधा था और अब करुणा वश नए साधकों की मदद करते हैं | ये लोग अथक परिश्रम द्वारा ये सुनिश्चित करते हैं की साधना का कार्यक्रम निर्विघ्न रूप से सम्पादित होता रहे और साधकों को कोई परेशानी ना हो |

10 दिन में 100 घंटे का ध्यान ! जो लोग साधू की जिंदगी को जी कर देखना चाहते हैं , एकांत में स्वअनुसंधान में आगे बढ़ना चाहते हैं उनके लिए ये जगह स्वर्ग से कम नहीं | जीवन तपस्वी की तरह जीना पड़ता है लेकिन कुछ साधक इससे घबडा कर बीच में भी भाग जाते हैं | ज्यादातर ये देखने में आता है की कुछ लोग दुसरे या छठे दिन छोड़ कर चले जाते हैं | पर जो लोग मन का खेल समझ कर रुक जाते हैं वो निश्चय ही धन्य होकर जाते हैं | शुरू के 3-4 दिन दिक्कत होती है , क्यूंकि शरीर और मन इस प्रकार के कार्यक्रम का अभ्यस्त नहीं होता लेकिन इसके बाद ही स्थूल संवेदनाओं से छुटकारा पाकर , सूक्ष्म संवेदनाओं पे काम शुरू हो जाता है . मन शांत , स्थिर , प्रसन्न , आनंदित होने लगता है , गहराइयों में जाकर अपने विकारों का अवलोकन करने लगता है | सुख और दुःख दोनों संवेदना अनित्य हैं ऐसा अनुभव कर मन समता में स्थित होने लगता है , शील समाधी और प्रज्ञा पुष्ट होने लगती है | अपना दुःख दूर होता देख बड़ी करुणा जागती है और मन करता है की काश सबका ऐसा कल्याण हो जाता , जिस तरह अपने दुःख दूर हुए वैसे ही सबके हो जाएँ . सबको ये शुद्ध विद्या का ज्ञान हो |

साधना प्रक्रिया :-

पहले साढ़े तीन दिन ( 3.5 दिन ) अनापानसती का अभ्यास करवाया जाता है , जिससे दिमाग बहुत तेज हो जाता है और मन सूक्ष्मतर संवेदनाओं को महसूस करने के लिए तैयार हो जाता है तब  विपश्यना सिखाई जाती है | विपश्यना से मन का ऑपरेशन शुरू हो जाता है , जैसे जैसे दिन बीतते हैं ऑपरेशन चित्त की गहराइयों में जाकर होने लगता है और तब अपने दुःख का वास्तविक कारण पता चलता है |

हमारे दुःख का कारण मन का समता भाव में स्थित ना होना ही है | राग और द्वेष ही हमारे दुःख का कारण हैं | अगर अच्छी संवेदना हो तो हमें सुख मिलता है और उस संवेदना के प्रति राग जागता है | फिर अगर वो संवेदना ना मिले तो दुःख प्राप्त होता है | वैसे ही अगर अच्छी संवेदना ना हो तो दुःख प्राप्त होता है और उसके प्रति चित्त में द्वेष पैदा करते हैं , जिससे चित्त व्याकुल हो जाता है , फिर और गहरा दुःख प्राप्त होता है | हम अपने मन के साथ ऐसा ही करते हैं जिससे , ये दुःख भोगता ही चला जाता है , इससे पार नहीं जा पाता |

विपश्यना में संवेदनाएं किस प्रकार अनित्य हैं इसका ज्ञान अपने अनुभव से होने लगता है | ये संवेदनाएं इतनी तीव्र गति से उत्पन्न और नष्ट होती हैं की ऐसा लगता है की ये नित्य हैं लेकिन जब हम उनका अवलोकन करने लगते हैं तो पता चलता है की , अरे ये तो सदा नहीं रहती , उत्पन्न नष्ट होती ही रहती है | अगर सुख की संवेदना अनित्य हैं तो फिर राग क्यूँ करना और दुःख की संवेदना भी अनित्य है तो फिर द्वेष क्यूँ करना | और ऐसा समझते ही देखते ही देखते संवेदना गायब | संवेदनाओं को महत्व नहीं देने से उनका संस्कार खत्म हो जाता है और मानस में अनेकों जन्मो के या ऐसा कहें की पूर्व में बसे संस्कार , संवेदनाओं के रूप में उभरते हैं और नष्ट होने लगते हैं | चित्त की सफाई होकर , विभिन्न और सूक्ष्मतर अनुभूतिओं से मन समता में स्थित होने लगता है , प्रज्ञा जागने लगती है |

मुझे ये साधना बहुत जबरदस्त लगी , बहुत ही शुद्ध , साम्प्रदाइकता से कोई लेना देना नहीं , सुख शान्ति और आनंद प्रदान करने वाली | और अगर ऐसा शिविर मिल जाए तो फिर मंगल ही मंगल है | कहने के लिए बहुत बाते हैं लेकिन जिस तरह से सबके संस्कार एक जैसे नहीं होते , ठीक उसी तरह संवेदनाएं भी एक जैसे नहीं उठती जिससे एक जैसे अनुभव नहीं होते . मुझे क्या अनुभव हुआ वो महत्वपूर्ण नहीं , मेरा जीवन धन्य हो गया ये महत्वपूर्ण है | अपने जीवन से 10 दिन का समय निकालिए और एक बार ये शिविर करके देखिये , बहुत कल्याण होगा |

विपासना की विद्या बहुत ही शुद्ध है इसीलिए बार बार विकृत होकर लुप्त होती रही है | ऋग्वेद में भी इसका वर्णन आता है लेकिन विद्या की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं होने से समझ नहीं आता | गौतम बुद्ध के द्वारा फिर से इस विद्या के प्रकटीकरण के बाद ये फिर से लुप्त हो गयी | हमारे पुराने ऋषि मुनिओं ने विपश्यना करके ही निर्वाण प्राप्त किया था लेकिन समय के साथ इसमें मिलावट की दुकानदारी से , जो लाभ मिलना था मिल नहीं पाया और ये लुप्त ही हो गयी | वर्मा में कुछ लोगों ने इस ज्ञान को २७०० वर्षों तक विशुद्ध रूप में बनाए रखा , कोई मिलावट नहीं होने दी और क्रमशः यह विद्या फिर से भारत आ पहुची | इसके लिए हम वर्मा के कृतज्ञ रहेंगे | गोयंका जी के गुरु जी के मन में ये बात दबी थी की कभी पुरे विश्व में इस शुद्ध विद्या का प्रचार करने वाला भारत आज फिर से कंगाल हो गया गया | भारत का ऋण हमें इस विद्या को लौटा कर ही चुकता करना होगा | ग्रंथों में कहीं ऐसी भविष्यवाणी भी है की ये २७०० बाद भारत में लुप्त हुई ये विद्या फिर से भारत के पास आएगी और यहाँ से पुरे विश्व में फ़ैल जायेगी | भविष्यवाणी का तो पता नहीं पर ऐसा बहुत तेजी से होते हम जरूर देख रहे | आज लोगों में फिर से विपश्यना के प्रति श्रधा जाग रही है और थोथे सम्प्रदाइकता को लोग नकार रहे | आप भी इसका स्वयं अनुभव करके जरूर देखें और अपना परम मंगल साध लें |

कोर्स की जानकारी :-

>विश्व में 164 + विपासना केंद्र हैं  और भारत में 71 हैं | आप अपने निवास स्थान के पास ही किसी केंद्र का पता लगा कर वहां इस प्रत्यक्ष विद्या का अनुभव लाभ ले सकते हैं |
>पूरी तरह निशुल्क है और दान से चलती है और दान भी उन्ही का स्वीकार किया जाता है जिन्होंने शिविर किया हो .
>वेबसाइट – www.dhamma.org
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कोर्स की जानकारी के लिए इस लिंक पे जाएँ – https://www.dhamma.org/en/courses/search

इस लिंक को खोल कर यहाँ पे अपने राज्य और कोर्स की भाषा डाल कर सर्च पे क्लिक करें , जिससे की आपके आसपास के सेंटर्स की जानकारी मिल जाएगी | केंद्र के निचे कोर्स का लिंक भी रहेगा , उसपे क्लिक करके पता कर लें की सीट कब खाली है फिर रजिस्टर पे क्लिक करके अपना आवेदन डाल दें . यहीं पे केंद्र के फ़ोन नंबर की  जानकारी भी मिल जायेगी , कॉल करके फ़ोन से भी आवेदन कर सकते हैं .

मंगल हो !  Be Happy :)

onkar kumar
I am a software enginner in an MNC with deep interest in spiritual stuffs . I have knowledge of healing such as Reiki , Prana voilet healing , Crystal healing etc .
I am Reiki Grand master , love meditation and inspire everyone to experience peaceful and blissful life .
It would be awesome if you would share your knowledge and experience . Thank you .